आये हो यहाँ तक,तो शुक्रिया हम केहेना चाहे,
आये ही हो तो कुछ मेरा लिखा पद के जाये,
दिल से लिखा है,
पसंद आये तो दो तारीफ के शब्द लिख दिजीये,
नहीं तो कुछ अपने सुझाव लिख दिजीये

Saturday, December 14, 2013

प्राप्तकाल के सनाते में जब हम लिखने बैठते ,
दिमाग सोया रहता था,
इसलिए दिल से लिखा करते.
लिखने में बड़ा सुकून मिलता था और सारा दिन खिल उठता था.
कागज़ पर जो हम कलम से लिखते थे वो हमारे दिल का तूकडा था.

 

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